ब्रजाचार्य पीठऊंचागांव, बरसानाEnglish

जीवन

मदुरै से ऊंचागांव तक

मदुरै में जन्मे एक बालक ने बारह वर्ष की आयु में घर छोड़ा और अपना जीवन ब्रज को दे दिया। यह उनकी कथा है, जैसी स्रोतों में मिलती है।

श्रील गोस्वामी नारायण भट्ट जी महाराज का पारंपरिक चित्र: वन में खड़े, हाथ में पोथी, एक हाथ से किसी स्थल की ओर संकेत
पीठ का पारंपरिक चित्र

मदुरै में जन्म

1531

उनका जन्म वैशाख शुक्ल चतुर्दशी, संवत 1588 (सन 1531) को, नृसिंह चतुर्दशी के दिन, दक्षिण के मदुरै नगर में हुआ। पिता भास्कर भट्ट माध्व संप्रदाय के भृगुवंशी ब्राह्मण थे और माता यशोमति थीं। स्रोत: हिंदी विकिपीडिया, हिस्ट्री पंडित

इसी तिथि पर हर वर्ष ऊंचागांव में उनकी समाधि पर जयंती मनती है। स्रोत: ब्रज ब्रेकिंग, सूचना, ब्रज ब्रेकिंग, 2025

मदुरै के मीनाक्षी मंदिर का एक गोपुरम
मदुरै, जहाँ उनका जन्म हुआ: मीनाक्षी मंदिर का एक गोपुरम।चित्र: Sundaram Perumal, CC BY-SA 4.0

ठाकुर जी का आदेश

परंपरा बताती है कि बचपन में गोदावरी की परिक्रमा के समय ठाकुर जी ने उन्हें आदेश दिया कि लुप्त हो चुके ब्रज को फिर से प्रकट करें। उन्होंने पूछा कि वे कैसे पहचानेंगे कि कौन सा स्थल लीला स्थल है। ठाकुर जी ने कहा कि मैं तुम्हारे साथ रहूँगा, और जहाँ कठिनाई होगी वहाँ मदद करूँगा। स्रोत: हिस्ट्री पंडित

ठाकुर जी लाड़ले स्वरूप में उनके साथ ब्रज आए। यही लाड़ले ठाकुर आज ऊंचागांव की ब्रजाचार्य पीठ में दाऊजी के मंदिर में विराजते हैं। स्रोत: हिस्ट्री पंडित

बारह वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया। स्रोत: हिंदी विकिपीडिया

भित्ति चित्र: वन में पोथी लिए नारायण भट्ट जी किसी स्थल की ओर संकेत करते हुए, पास में हाथ जोड़े एक और व्यक्ति
भित्ति चित्र: वन में पोथी लिए नारायण भट्ट जी, किसी स्थल की ओर संकेत करते हुए।चित्र: ब्रजाचार्य पीठ

राधाकुंड: दीक्षा और बारह वर्ष

1545 से

संवत 1602 (सन 1545) में, लगभग चौदह वर्ष की आयु में, वे ब्रज पहुँचे। राधाकुंड पर उन्होंने कृष्णदास ब्रह्मचारी से दीक्षा ली, जो गदाधर पंडित के शिष्य थे और वहाँ मदनमोहन जी की सेवा करते थे। स्रोत: हिंदी विकिपीडिया, ब्रज रस

लगभग बारह वर्ष वे राधाकुंड पर रहे, और ब्रज को फिर से प्रकट करने का काम उन्होंने यहीं से शुरू किया। स्रोत: हिंदी विकिपीडिया, हिस्ट्री पंडित

राधाकुंड
राधाकुंड, जहाँ उन्होंने दीक्षा ली और लगभग बारह वर्ष रहे।चित्र: Kridha20, CC BY-SA 4.0

खोए ब्रज की खोज

1552

हिस्ट्री पंडित लिखता है कि कृष्ण के बाद ब्रज की लीला स्थलियों को सहेजने का काम दो लोगों ने किया: पहले कृष्ण के वंशज वज्रनाभ ने, और फिर सोलहवीं सदी में दक्षिण से आए नारायण भट्ट जी ने। स्रोत: हिस्ट्री पंडित

उनके समय तक ब्रज के बहुत से वन, कुंड और लीला स्थल लुप्त हो चुके थे। नारायण भट्ट जी ने उन्हें खोजा, उनके नाम रखे, जीर्णोद्धार कराया और हर स्थल की पूजा की विधि तय की। स्रोत: हिस्ट्री पंडित

उन्होंने ब्रज के 300 से अधिक स्थल फिर से खोजे और 1552 में ब्रज भक्ति विलास लिखा, जिसमें ब्रज का यह भूगोल दर्ज है। उनके प्रयासों से चौरासी कोस परिक्रमा बनी, और ग्राउज़ के अनुसार ब्रज की वन यात्रा भी सबसे पहले उन्होंने ही शुरू की। स्रोत: ब्रज रस, ग्राउज़, 1883

1883 में मथुरा के कलेक्टर एफ़. एस. ग्राउज़ ने लिखा कि ब्रज के घेरे की हर झील और हर कुंज को अलग नाम उन्हीं से मिला, जबकि पुराने पुराणों में ऐसे सात आठ स्थल ही मिलते हैं। स्रोत: ग्राउज़, 1883

लगभग 1600 में नाभादास जी ने भक्तमाल में लिखा कि वराह पुराण में मथुरा मंडल के जितने गुप्त स्थल बताए गए हैं, उन्हें नारायण भट्ट जी ने प्रकट किया और सारी पृथ्वी ने उन्हें जाना। स्रोत: श्री भक्तमाल

भित्ति चित्र: हाथ में ब्रज भक्ति विलास लिए, किसी स्थल की ओर संकेत करते नारायण भट्ट जी, पास में हाथ जोड़े एक वृद्ध संत
भित्ति चित्र: हाथ में ब्रज भक्ति विलास (ब्र॰ भ॰ वि॰) लिए नारायण भट्ट जी।चित्र: ब्रजाचार्य पीठ

ऊंचागांव और ब्रजाचार्य पीठ

लगभग 1557 से

राधाकुंड पर बारह वर्ष बिताकर वे बरसाना के पास ऊंचागांव में बस गए। स्रोत: हिंदी विकिपीडिया, हिस्ट्री पंडित

ऊंचागांव में उन्होंने बलदेव जी (दाऊजी) को रेवती जी के साथ प्रतिष्ठित किया। यहीं उन्होंने ब्रजाचार्य पीठ की स्थापना की और परिवार के साथ रहने लगे। उनके वंशज आज भी यहीं रहते हैं। स्रोत: हिंदी विकिपीडिया, हिस्ट्री पंडित, ब्रज ब्रेकिंग, 2025

बरसाना में लाडली जी

बरसाना के ब्रह्मांचल पर्वत पर लाडली जी का विग्रह उनके आगे प्रकट हुआ, और वहीं मंदिर की स्थापना हुई। स्रोत: हिस्ट्री पंडित, वृंदावन टुडे

संगीत नाटक के 2005 के एक शोधपत्र के अनुसार श्रीजी का मंदिर 1569 में स्थापित हुआ, और नारायण भट्ट जी बरसाना की राधा को अपनी बेटी मानकर पूजते थे। स्रोत: संगीत नाटक, 2005

मथुरा के पत्रकार विवेक दत्त ने एक अख़बार लेख में लिखा कि राधा जी को 'लाडो' नाम नारायण भट्ट जी ने दिया। वे उन्हें लाडो, लड़ैती और लाडली कहकर पुकारते थे, और इसी से ब्रजवासी बरसाना के मंदिर को लाडली जी का मंदिर कहते हैं। स्रोत: विवेक दत्त, अख़बार लेख

लाडली जी की सेवा उन्होंने अपने शिष्य नारायण दास गोस्वामी को सौंपी। उनके वंशज आज श्रीजी के सेवायत गोस्वामी हैं। स्रोत: वृंदावन टुडे

बरसाना का ब्रह्मांचल पर्वत, शिखर पर श्री लाडली जी का मंदिर
ब्रह्मांचल पर्वत, जिस पर श्रीजी का मंदिर है।चित्र: Kridha20, CC BY-SA 4.0

प्राकट्य की पूरी कथा

रास और उत्सव

उन्होंने ब्रज के गोप बालकों को ठाकुर जी और उनके सखाओं का वेश धारण कराकर रासलीला कराई और रास मंडलियों की स्थापना की। ग्राउज़ ने 1883 में लिखा कि वन यात्रा और रासलीला सबसे पहले उन्होंने ही स्थापित कीं। स्रोत: हिस्ट्री पंडित, हिंदी विकिपीडिया, ग्राउज़, 1883

भक्तमाल का अगला छप्पय ब्रजवल्लभ जी पर है, जो नृत्य और गान में निपुण थे और रास में रस बरसाते थे; उसमें लिखा है कि उन्होंने श्री नारायण भट्ट प्रभु को परम प्रीति से वश में कर लिया। स्रोत: श्री भक्तमाल

उनकी ब्रजोत्सव चंद्रिका ब्रज के उत्सवों का ग्रंथ है: कौन सा उत्सव कहाँ और कैसे मनता है। बरसाना की बूढ़ी लीला राधाष्टमी से असली लीला स्थलों पर खेली जाती है, और 2005 के शोधपत्र में वह तब भी उसी क्रम में चल रही थी जो उन्होंने लिखा था। स्रोत: वृंदावन टुडे, हिंदी विकिपीडिया, संगीत नाटक, 2005

उदयपुर के दरबार में रासलीला का मंचन, महाराणा जगत सिंह देखते हुए
महाराणा जगत सिंह रासलीला देखते हुए, उदयपुर, 1736।चित्र: जय राम और जीवा (माने जाते हैं), उदयपुर, 1736, क्लीवलैंड म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, CC0

ग्रंथ

उन्होंने कितने ग्रंथ लिखे, इस पर स्रोत अलग हैं: 2005 का शोधपत्र 24 गिनता है, हिस्ट्री पंडित लगभग 52 और हिंदी विकिपीडिया लगभग 60। अधिकतर ग्रंथ अब मिलते नहीं। स्रोत: संगीत नाटक, 2005, हिस्ट्री पंडित, हिंदी विकिपीडिया

जिनके नाम मिलते हैं, उनमें ब्रज भक्ति विलास, ब्रजोत्सव चंद्रिका और लीला पर लिखा प्रेमांकुर नाटक हैं। ग्रंथों का अलग पन्ना 24 नवंबर तक आएगा, श्लोकों के हिंदी और अंग्रेज़ी अर्थ के साथ। स्रोत: हिंदी विकिपीडिया

ब्रजाचार्य, नारद अवतार

उस समय के विद्वानों और संतों ने उनके ज्ञान और भक्ति को मानकर उन्हें ब्रजाचार्य की उपाधि दी, और ब्रज उन्हें नारद अवतार कहता है। स्रोत: हिस्ट्री पंडित, ब्रज ब्रेकिंग, 2025

विवेक दत्त के अख़बार लेख के अनुसार ब्रजाचार्य की उपाधि उन्हें काशी के विद्वानों ने दी। स्रोत: विवेक दत्त, अख़बार लेख

वामन द्वादशी

उन्होंने वामन द्वादशी को देह त्यागी। स्रोत: हिंदी विकिपीडिया

उनकी समाधि ऊंचागांव में है, और उसके पास वह दाऊजी मंदिर है जिसमें वे स्वयं सेवा करते थे। स्रोत: हिस्ट्री पंडित, इस्कॉन (ऊंचागांव)

वामन द्वादशी राधाष्टमी के चार दिन बाद आती है।

ऊंचागांव में श्री नारायण भट्ट जी की समाधि, गुलाल से रंगे आँगन में दर्शन करते भक्त
ऊंचागांव में उनकी समाधि।चित्र: हिस्ट्री पंडित

इस पन्ने के स्रोत

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